Sunday, 17 July 2016

ग्रहण [Inside story by Rohit Sharma]







महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में लगातार तीन साल से सूखा पड़ रहा है और इस साल इसने त्रासदी का रूप ले लिया. इस स्थिति ने कई दूसरी समस्याओं को भी जन्म दे दिया है. पानी की कमी से मौत, विस्थापन, मानव तस्करी और शादियों के टूटने जैसे खतरों ने इस क्षेत्र के जनजीवन को तार-तार कर दिया है. 42 डिग्री सेल्सियस की तपा देने वाली धूप और भीषण गर्मी के बीच सधे हुए कदमों से अपने घर की ओर बढ़ती हुई 10 साल की अमृता मुजमुले इस बात का पूरा ध्यान रखे हुए है कि उसके सिर पर रखे हुए घड़े का पानी जरा भी न छलके. अमृता हर रोज़ करीब 4० किमी. का फासला सिर्फ पानी भरने के लिए पूरा करती हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि उसे दिनभर में अपने घर से दो किमी. की दूरी पर स्थित कुएं पर 10 बार पानी भरने जाना पड़ता है. सोचिए अगर शहर में आपको अपने घर से हर रोज 200 मीटर ही दूर पानी भरने जाना पड़े तो आप पर क्या बीतेगी.

अमृता जैसे कई बच्चे हैं जो हर रोज कई मील दूर अपने परिवारों की पानी की जरूरत को पूरा करने के लिए 10-10 चक्कर लगाते हैं. कई बार भीषण गर्मी से शरीर में पानी की कमी और कई बार कुओं में गिर जाने से, ये काल के गाल में भी समा जाते हैं. ऐसी कई घटनाएं हैं जो सूखाग्रस्त महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र की हकीकत से रूबरू कराती हैं. हम ने मराठवाड़ा के बीड जिले का दौरा किया और पाया कि पानी की कमी से मौत, विस्थापन, मानव तस्करी, अवैध हिरासत और शादियों के टूटने के खतरे ने इस क्षेत्र के जनजीवन को तार-तार कर दिया है.

अमृता के दिन की शुरुआत सुबह छह बजे हो जाती है. वह उठते ही अपनी मां और दो छोटी बहनों के साथ दो किमी दूर स्थित कुएं में पानी भरने निकल जाती है. वह कहती है, ‘हम सुबह उठते ही यहां आ जाते हैं. कभी-कभी हमें पानी भरने के लिए एक घंटा इंतजार करना पड़ता है और कभी-कभी नंबर आने में 4-5 घंटे लग जाते हैं. शाम को चार बजे हमें फिर से यहां पानी भरने आना पड़ता है, कुल मिलाकर दिन भर में पानी भरने के लिए हम 10 चक्कर तो लगा ही लेते हैं.’ अमृता की मां शीला मुजमुले कहती हैं, ‘मुझे अपनी छोटी-छोटी बच्चियों को इस तरह पानी भरता देख दुख होता है, लेकिन क्या करूं मेरे पास इसके अलावा कोई विकल्प नहीं है. सूखे की वजह से यहां पानी की इतनी किल्लत है कि अगर हम कुओं से पानी नहीं भरेंगे तो प्यास से मर जाएंगे. दिन भर में औरतें और बच्चे लगभग पांच-छह घंटे कुओं, नलों और टैंकरों से पानी भरने में गुजारते हैं. हाल ये है कि हम दिन भर सिर्फ पानी भरने के बारे में सोचते रहते हैं और किसी काम की तरफ ध्यान जाता ही नहीं है.’मराठवाड़ा में कर्ज और फसलों के नुकसान के चलते किसान आत्महत्या करने को मजबूर हैं. साथ ही पानी भरने के दौरान हुए हादसों के भी कई मामले सामने आए हैं. बीड जिले में पिछले तीन महीनों में पानी भरने के दौरान आठ बच्चों की मौत हो चुकी है. 21 अप्रैल की सुबह खेज तहसील के वीडा गांव में 10 साल के सचिन खेंगेरे की कुएं से पानी भरने के दौरान उसमें गिरकर मौत हो गई. गांव के सरपंच बापूसाहेब देशमुख कहते हैं, ‘गांव के हर परिवार को पता है कि बच्चों का कुओं पर पानी भरना खतरनाक है. हमारे गांव में चार कुएं हैं और सभी गांववालों को बताया हुआ है कि बच्चों को पानी भरने न तो साथ लाएं और न ही अकेले भेजें, लेकिन कोई सुनता नहीं है. टैंकरों से पानी बांट नहीं सकते क्योंकि पानी भरने के दौरान लोग आपस में झगड़ने लगते हैं.’

मराठवाड़ा में सूखे से उपजी पानी की कमी के बारे में थोड़ी-बहुत जानकारी तो सभी को है लेकिन इसका महिलाओं और बच्चों को क्या खामियाजा भुगतना पड़ता है इसकी ओर लोगों का ध्यान तब आकर्षित हुआ जब 18 अप्रैल को बीड जिले की आष्टी तहसील के सबलखेड गांव में रहने वाली 12 साल की योगिता देसाई की पानी भरने के दौरान मौत हो गई. यह मौत लू लगने की वजह से हुई थी. योगिता दिन में कई बार कड़ी धूप में पानी भरने जाती थी. उस रोज जब वह 5वीं बार हैंडपंप पर पानी भरने गई तो बेहोश होकर गिर गई और फिर उसे कभी होश नहीं आया. स्थानीय गुरुदत्त अस्पताल में काम करने वाले डॉ. हनुमंत काकड़े, जिन्होंने योगिता की जांच की थी, कहते हैं, ‘बच्ची को पिछले 24 घंटों से बुखार था. घटना वाले दिन उसे सुबह उल्टियां भी हुई थीं लेकिन फिर भी वह पानी भर रही थी. लू लगने और शरीर में पानी की कमी की वजह से उसकी मृत्यु हो गई.’ योगिता के चाचा ईश्वर देसाई कहते हैं, ‘हमारे गांव में बाकी कामों के लिए पर्याप्त पानी है लेकिन पीने के पानी की कमी है इसलिए बच्चे-बूढ़े सभी लोग पानी भरने जाते हैं.’

इसी साल फरवरी में गेवराई तहसील के बाग पिंपलगांव में 10 साल की राजश्री कांबले की भी पानी भरते समय कुएं में गिरकर मौत हो गई. उसके पिता नामदेव कांबले के अनुसार, ‘स्कूल में मध्याह्न भोजन खाने के बाद वहां पानी न होने के चलते वह घर पर पानी पीने आई थी लेकिन जब घर पर भी पानी नहीं मिला तो वह कुएं से पानी भरने गई और उसमें गिर पड़ी.’ नामदेव कांबले ने इस हादसे के बाद गांव के सरपंच के खिलाफ गेवराई थाने में शिकायत दर्ज कराई. उन्होंने अपनी शिकायत में कहा था कि गांव में जल स्वराज्य योजना के तहत बने कुएं में पर्याप्त पानी होने के बावजूद  सरपंच ने दलित बस्तियों में जा रही पाइप लाइनों में पानी नहीं छोड़ा, जिसके चलते लोगों को दूसरे कुओं से पानी भरने जाना पड़ता है और इसी वजह से उनकी बेटी की मौत हो गई. गांव की सरपंच सत्यभामा चितलकर से बातचीत करने की कोशिश की गई तो उनके पति जनार्दन चितलकर उनका पक्ष रखते हुए कहते हैं, ‘जब कुएं में पर्याप्त पानी था तो नलों में पानी छोड़ा जाता था लेकिन सूखे के चलते कुएं में पानी की कमी हो गई है और इस वजह से हमने नलों में पानी छोड़ना बंद कर दिया है. अब सभी लोग कुएं से पानी भरने आते हैं, किसी के साथ भी कोई भेदभाव नहीं हुआ है.’

इसी साल जनवरी में नौ साल की कोमल जगताप की कुएं में गिरकर मौत हो गई. कोमल के माता-पिता उस वक्त कर्नाटक में गन्ने की कटाई करने के लिए गए थे. कोमल तब अपने मामा के साथ गेवराई तहसील के जातेगांव में रहती थी. मामा सतीश चह्वाण बताते है, ‘उस कुएं में पानी बहुत कम था, इसलिए पानी भरने के दौरान जब वह उसमें गिरी तो उसके सिर पर चोट लगी जिससे उसकी मौत हो गई.’

पलायन 
मराठवाड़ा में लगातार तीन साल से अकाल की स्थिति है और इस साल हालत बुरी तरह से बिगड़ चुकी है. फसलें नष्ट हो चुकी हैं. इन हालात में तमाम लोग रोजी-रोटी के जुगाड़ में ग्रामीण इलाकों से शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं. पानी की कमी और बेरोजगारी ने इस विस्थापन को इतना विकराल रूप दे दिया है कि मराठवाड़ा के ग्रामीण क्षेत्रों की 40 प्रतिशत आबादी पश्चिम महाराष्ट्र के बड़े-छोटे शहरों की ओर कूच कर गई है. पुणे, कोल्हापुर, मुंबई जैसे शहरों में मराठवाड़ा से आए लोगों का तांता लगा हुआ है. ये किसान शहरों में मजदूरी करके अपना पेट पाल रहे हैं. क्षेत्र के कई गांवों का दौरा करने के बाद स्थिति बिल्कुल साफ हो जाती है.खाली सड़कें और घर के दरवाजों पर लगे ताले उपली गांव में एक आम नजारा है. बीड जिले की वडवनी तहसील की पांच हजार की आबादी वाला यह गांव अब वीरान-सा नजर आता है. स्थानीय लोगों के मुताबिक इस गांव के 300 परिवार अपना घर-बार छोड़कर शहर पलायन कर चुके हैं और बाकी भी शहर जाने की योजना बना रहे हैं. बहुत- से लोग तो अपने बूढ़े मां-बाप को गांवों में ही छोड़कर जा चुके हैं.

70 वर्षीय जयराम इचके अपने परिवार सहित काम की तलाश में पुणे जा रहे हैं. उनकी माली हालत इतनी खराब है कि कुछ दिन पहले उनके पास शक्कर तक खरीदने के पैसे नहीं थे. उनकी बीमार बेटी के लिए दवाई तक का इंतजाम वह नहीं कर पा रहे थे. इचके को शक्कर और दवाई का इंतजाम करने के लिए घर में रखा पलंग और एक पुराना टेलीविजन बेचना पड़ा. वे कहते हैं, ‘यहां पानी की बहुत कमी है जिसके चलते न ही यहां खेती बची है और न ही कोई काम. मेरे बेटे की मृत्यु बहुत साल पहले हो गई थी, इसलिए मेरी पत्नी और बेटी की जिम्मेदारी मुझ पर है. हमने पुणे जाने का फैसला कर लिया है. अभी फिलहाल वहां मजदूरी करने के बारे में सोचा है.’ इसी गांव के विष्णु सावंत अपने परिवार के साथ पुणे रहने लगे हैं. सावंत कहते हैं, ‘सूखे के चलते मुझे अपनी पौने दो एकड़ खेती बेचनी पड़ी. बेटी की शादी के लिए भी साहूकार से डेढ़ लाख रुपये का कर्ज लिया था लेकिन कर्ज न चुका पाने की वजह से मुझे अपना घर उसके नाम करना पड़ा. ऐसी परिस्थिति में मजबूरन शहर जाना पड़ा.’ सावंत का 16 वर्षीय लड़का भी उनके साथ मजदूरी करता है. पैसों की कमी के चलते उसे पढ़ाई छोड़नी पड़ी. सावंत कहते हैं, ‘मैं अपने बेटे को स्कूल भेजना चाहता था, लेकिन अभी अपने परिवार को दो जून की रोटी खिलाना ज्यादा जरूरी है. क्या करें, हमारे जैसे लोगों के जीवन में ज्यादा विकल्प नहीं होते.’

उपली में रहने वाली सामाजिक कार्यकर्ता कांता इचके ने बताया, ‘ग्रामीण अपनी जमीन-जायदाद बेचकर पश्चिम महाराष्ट्र के शहरों में पलायन कर रहे हैं. स्थिति इतनी खराब है कि लोग अपना घर बेचकर शहर जाने के लिए किराये का जुगाड़ कर रहे हैं ताकि वहां पहुंचकर उन्हें कुछ रोजगार मिल सके. कोई भी गांव में रहना नहीं चाहता.’ इस गांव में पानी की इतनी ज्यादा कमी है कि लोगों को पानी पांच दिन में एक बार नसीब होता है. गांववालों ने बताया कि पानी भरने के लिए हर परिवार को सरपंच को 50 रुपये देने पड़ते हैं. दत्ता नातेवाइके ने बताया, ‘अगर पैसे न दिए जाएं तो सरपंच के लोग पानी भरने नहीं देते और गांव के नलों पर ताला लगा देते हैं.’ इस बारे में गांव की सरपंच असरबी शेख से बात की तो वे कहती हैं, ‘गांव में लगे हुए नल और पाइपलाइन सरकारी पैसों से नहीं बल्कि हमने अपने निजी खर्चे से लगवाए हैं इसीलिए हर परिवार से पानी भरने के लिए हम 50 रुपये लेते हैं. हालांकि गरीबों को इससे निजात है.’ नलों पर ताले लगाने के बारे में वे कहती हैं, ‘गांव में पानी 3-4 दिन में एक दफा आता है. नलों पर ताले इसलिए लगाए हैं ताकि सबको समान रूप से पानी मिले और कोई विवाद न हो.’

माजल गांव तहसील स्थित झरनेवाड़ी गांव के 40 वर्षीय रामराव मुथाल ने अपने खेत पर एक बोर्ड लगा रखा है जिस पर मराठी में लिखा है, ‘जमीन बिक्रि आहे’ यानी ये जमीन बिकाऊ है. मुथाल जमीन बेचकर अपनी तीन बेटियों की शादी के लिए ग्रामीण बैंक और साहूकार से लिया हुआ छह लाख रुपये का कर्ज चुकाकर मुंबई या पुणे जाकर बसना चाहते हैं. वे कहते हैं, ‘पिछले दो सालों से फसल नहीं हुई है. यहां पीने के लिए पानी नहीं है तो खेती के लिए पानी कहां से आएगा. जमीन बेचना जरूरी है वरना बैंक और साहूकार का कर्ज कैसे चुकाएंगे. हालात ऐसे हैं कि शहर जाकर मजदूरी करना ही एक विकल्प रह गया है.’बीड जिले के पुसरा गांव के विलास जोगड़े एक भूमिहीन मजदूर थे. उन्होंने अपनी बेटी की शादी के लिए पिछले साल 1.5 लाख रुपये का कर्ज लिया था लेकिन सूखे के चलते वे इतने पैसे नहीं कमा पाए कि कर्ज चुका सकें. इस साल अप्रैल में उन्होंने पेड़ से फांसी लगाकर अपनी जान दे दी. उनके अंतिम संस्कार तक के लिए उनकी पत्नी प्रियंका जोगड़े को 10 हजार रुपये का कर्ज लेना पड़ा.

उनकी पत्नी प्रियंका नम आंखों से कहती हैं, ‘उन्होंने हमारी बेटी की शादी के लिए कर्ज लिया था लेकिन विडंबना ये है कि बेटी के पति ने उसे एक साल में ही छोड़ दिया. मेरे पास तो 10वीं कक्षा में पढ़ने वाले बेटे की पढ़ाई के लिए भी पैसे नहीं हैं. सरकार भूमिहीन किसानों के लिए कुछ नहीं करती. गांव में भी कुछ काम नहीं है, अब हमें शहर जाकर मजदूरी करनी पड़ेगी.’

गेवराई तहसील के जातेगांव की रहने वाली जनाबाई चह्वाण की आंखें आज भी अपने बेटे का जिक्र आने के साथ नम हो जाती हैं. उनके 23 वर्षीय बेटे सखाराम चह्वाण ने 15 महीने पहले जहर पीकर अपनी जान दे दी थी. सखाराम ने खेत में कुआं बनाने के लिए तीन लाख रुपये का कर्ज लिया था जिसे वे चुका नहीं पाए थे. सरकार की तरफ से उनके परिवार को एक लाख रुपये का मुआवजा दिया गया था और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत उन्हें लाभार्थी बनाकर उनके खेत पर एक कुआं बनाया जा रहा है लेकिन इसकी प्रक्रिया में उनके माता-पिता को विभिन्न दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं और संबंधित अधिकारियों को उनकी फाइल बढ़ाने के लिए रिश्वत भी देनी पड़ रही है. जनाबाई कहती हैं, ‘बेहतर होता कि सरकार हमें मुआवजे के रूप में कुछ पैसे दे देती यह कुएं का निर्माण जी का जंजाल बन चुका है.’

बीड कलेक्ट्रेट में कार्यरत एक अधिकारी अपना नाम न लिखने की शर्त पर बताते हैं, ‘ब्लॉक लेवल पर अधिकारी किसानों का मुआवजा पास कराने के लिए उनसे 15 प्रतिशत तक का कमीशन मांगते हैं. यह दुख की बात है लेकिन बिना इसके काम नहीं होता.’ बीड जिले के कलेक्टर नवल किशोर राम मानते हैं कि भूमिहीन मजदूरों के परिवारों को किसी भी तरह का मुआवजा नहीं दिया जाता लेकिन सरकार एक नई नीति जल्द ही बनाएगी जिसके तहत भूमिहीनों को लाभ मिलेगा. उन्होंने बताया, ‘मुआवजा देने से पहले वह तीन बातों की तसल्ली जरूर करते है. जिस व्यक्ति ने आत्महत्या की है क्या उसने कोई कर्ज लिया है, क्या उसकी फसल बर्बाद हो चुकी है और तीसरी यह कि क्या बैंक वाले उनके घर चक्कर लगा रहे हैं?’ नवल किशोर राम आगे कहते हैं, ‘आत्महत्या कोई भी करे उसे आत्महत्या ही माना जाएगा. सरकार नई नीति लेकर आएगी जिसके तहत कोई भी किसान भूमिहीन या जिनके पास भूमि है अगर सूखे की वजह से या खेती में हुए नुकसान की वजह से आत्महत्या करता है तो सरकार उसे मुआवजा देगी.’ वे यह भी कहते है कि अगर कोई अधिकारी किसानों को मुआवजा देते वक्त भ्रष्टाचार करता है तो उसे कड़ी से कड़ी सजा मिलेगी.
बंधुआ मजदूरी के लिए मजबूर

बीड को गन्ना काटने वाले मजदूरों का गढ़ कहा जाता है. महाराष्ट्र में गन्ना काटने वाले मजदूरों की संख्या तकरीबन नौ लाख है और इनमें से चार लाख बीड के रहवासी हैं. प्रायः भूमिहीन मजदूर ही गन्ने की कटाई का काम करते हैं. यह अक्टूबर से लेकर मई के बीच होता है. गन्ना काटने के लिए ये मजदूर पश्चिम महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के तमाम शहरों में जाते हैं लेकिन सूखा के चलते इन भूमिहीन मजदूरों के संघर्षपूर्ण और शोषित जीवन में एक ऐसा उतार आया है जो बंधुआ मजदूरी की याद दिलाता है. इन भूमिहीन मजदूरों को काम देने वाले इनके ठेकेदार जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘मुकादम’ कहा जाता है, फसल के उत्पादन में आई कमी के चलते इन्हें कैद रखने लगे हैं. इन मजदूरों का जीवन बेहद कठिन होता है. साल के आठ महीने ये अपने घर से कोसों दूर अस्थायी घरों में गुजारते हैं. इनके बच्चे भी इनके साथ चले जाते हैं जिसके चलते उनकी पढ़ाई बीच में ही छूट जाती है. हालांकि कुछ मजदूर अपने बच्चों को घर के बड़े-बुजुर्गों के पास छोड़कर जाते हैं ताकि वे पढ़-लिख सकें. ये मजदूर शक्कर कारखाने वाले मुकादम के साथ गन्ने की कटाई का करार करते हैं और मुकादम इन्हें गन्ना काटने के लिए अलग-अलग इलाकों में लेकर आते हैं. मुकादम जोड़ों (पति-पत्नी) के रूप में मजदूरों को लाते हैं. उन्हें एक अग्रिम रकम दे दी जाती है. मुकादम को शक्कर कारखानों से तो पैसे मिलते ही हैं उसमें से 20 प्रतिशत कमीशन मुकादम को देना पड़ता है. दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि अगर इन मुकादमों को लगता है कि मजदूरों ने उन्हें अग्रिम रूप से मिली हुई रकम के अनुसार गन्ने नहीं काटे तो वे इन्हें पैसे लौटाने के लिए मजबूर करते हैं. सामाजिक कार्यकर्ता राजू थोराट कहते हैं, ‘मुकादम हर गांव से 100-200 जोड़े अपने साथ ले जाते हैं. आठ महीने काम करने के लिए ये प्रति जोड़ा मात्र 30,000 से 80,000 रुपये तक देते हैं. उनसे कोल्हू के बैल की तरह काम करवाया जाता है. सूखे के चलते गन्ने की उपज कम हो गई है जिसके चलते मजदूरों का काम निर्धारित समय के पहले ही पूरा हो जाता है. ऐसी स्थिति में मुकादम इन लोगों को दी हुई रकम का कुछ हिस्सा लौटाने के लिए बाधित करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि मजदूरों ने मिली हुई रकम के हिसाब से गन्ने नहीं काटे. ऐसी सूरत में अगर मजदूर पैसे नहीं लौटा पाते तो उन्हें बंधक बना लिया जाता है और तब तक नहीं छोड़ा जाता जब तक उनके दोस्त या रिश्तेदार वह रकम मुकादम को लौटा नहीं देते.’बंधक बनाए गए कुछ मजदूरों ने अपने अनुभव ‘हम  से साझा किए हैं. बीड में काम करने वाली एक गैर-सरकारी संस्था ‘मानवीय हक अभियान’ के प्रयासों से इन्हें छुड़ाया गया था. बीड जिले की धारूर तहसील की रहने वाली 29 वर्षीया जयश्री मुजमुले ने अपनी व्यथा सुनाते हुए बताया कि उन्हें और उनके जैसे 20 दूसरे जोड़ों (पति-पत्नी) व उनके बच्चों को कर्नाटक के गुलबर्गा में इस साल फरवरी में एक महीने तक बंधक बनाकर रखा गया था. जयश्री कहती हैं, ‘हमें और हमारे बच्चों को जानवरों की तरह एक मैदान में रखा गया था. मैदान के चारों ओर मुकादम के आदमियों का पहरा रहता था. हमारे सिर पर न छत थी और न ही हमें एक महीने तक खाना दिया गया था. हम-में से कुछ लोगों को मुकादम के आदमी एक आटा चक्की ले जाते थे और वहां जमीन पर पड़ा आटा उठवाकर वापस ले आते थे. उस आटे की रोटियों और गांव से साथ में लाए हुए बचे-खुचे ज्वार-बाजरे से हमने अपना और बच्चों का गुजारा किया था. हमारे कुछ लोगों को वे मारते-पीटते भी थे.’

बीड के कारी गांव के रहने वाले विजय कसबे की भी यही कहानी है. उन्हें भी कर्नाटक में एक महीना बंधक बनाकर रखा गया था. विजय ने बताया कि मुकादम ने उन्हें और उनकी पत्नी को छह महीने तक काम करने के लिए 50,000 रुपये दिए थे लेकिन पानी की कमी की वजह से उपज कम हुई थी इसलिए काम तीन महीने में ही खत्म हो गया, जिसके बाद मुकादम उन पर तीन महीने का बकाया पैसा लौटाने के लिए दबाव बनाने लगा और फिर उन्हें एक महीने तक बंधक बनाकर रखा गया. कसबे कहते हैं, ‘हम गरीब लोग हैं. हमारे पूरे परिवार का पेट गन्ने की कटाई में कमाए गए पैसों से पलता है. शादी, दवा, बच्चों की पढ़ाई सब कुछ इन पैसों के बल पर होता है. इसलिए जब पैसा आता है तो एक ही बार में खर्च हो जाता है. मुकादम को लौटाने के लिए हमारे पास कुछ नहीं बचता. लेकिन ये हमारी मजबूरी है कि इतनी कठिनाइयों और शोषण के बावजूद हम वापस उन्हीं लोगों के साथ काम पर जाते हैं. अगर नहीं जाएंगे तो परिवार को कैसे पालेंगे.’जालना जिले के चिंचोली गांव के रहने वाले राहुल पालेकरएओ को भी पंढरपुर में 15 दिन तक मुकादम ने बंधक बनाकर रखा था. वे कहते हैं, ‘हमें 60,000 रुपये दिए गए थे. हम लोग रोज सुबह चार बजे उठते थे और रात 12 बजे तक काम करते थे. लगभग 20 घंटे काम करते थे, कम उपज के चलते मुकादम हमें चार जगह गन्ने की कटाई और ढुलाई के लिए ले गया था. लेकिन इतना काम करने के बावजूद उसे लगा कि हमने रकम के हिसाब से गन्ने नहीं काटे हैं और हमें 15 दिन के लिए बंधक बना लिया.’ पालेकरएओ के साथ दस अन्य जोड़ों को भी एक बिल्डिंग में बंधक बनाकर रखा गया था, पुरुषों को एक कमरे में बंद कर दिया गया था सिर्फ महिलाओं को बाहर जाकर दिहाड़ी मजदूर की तरह काम करने की इजाजत थी वह भी इसलिए ताकि बंधकों के खाने का इंतजाम हो जाए.

लोकसभा सांसद और स्वाभिमानी शेतकरी संगठन के अध्यक्ष राजू शेट्टी के अनुसार बिचौलियों को मजदूर और कारखानों के बीच से हटाकर पारदर्शिता बढ़ानी चाहिए. शेट्टी कहते हैं, ‘मुकादमों द्वारा संचालित इस प्रणाली पर प्रतिबंध लगना चाहिए. ये मुकादम कोई और नहीं बल्कि स्थानीय नेता या उनके चमचे होते हैं जिनका स्थानीय राजनीति में हस्तक्षेप होता है. ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए जिसके तहत मजदूर और कारखानों का सीधा संपर्क हो सके और इन ठेकेदारों का सफाया हो जाए.’

टूटती शादियां

बीड जिले के बाबी तांडा गांव में मटकों और बाल्टियों की एक लंबी कतार लगी हुई है. महिला-पुरुष, छोटे-बड़े सभी लोग गांव के एकमात्र नल के आगे पानी भरने के इंतजार में खड़े हुए हैं. बंजारों के इस गांव में इस साल 100 लड़कियों की शादियां टूट चुकी हैं, 800 की आबादी वाले इस गांव में पानी की कमी को लोग अपनी बेटियों की शादी टूटने का कारण बताते हैं. 50 वर्षीया केसरबाई राठौड़ कहती हैं, ‘पानी के चलते किसी के पास कोई काम नहीं है, अब जब काम ही नहीं है तो बेटियों की शादी में हुंडा (दहेज) कहां से दें. लड़के वाले बिना दहेज के शादी करने से मना कर देते हैं.’ 19 वर्षीय कविता राठौड़ की शादी मई में होने वाली थी, लेकिन दहेज का इंतजाम न हो पाने की वजह से उनकी शादी टूट गई. वे कहती हैं, ‘मैं 12वीं तक पढ़ी हूं और नर्सिंग की पढ़ाई करना चाहती थी, लेकिन शादी तय होने की वजह से और पैसों की कमी के चलते पढ़ नहीं पाई. मेरे माता-पिता शादी और पढ़ाई दोनों का खर्च नहीं उठा सकते थे. उनका मानना है कि पढ़ाई करने के बाद नौकरी के जरिए मिले हुए पैसे तो मेरे पति को ही मिलेंगे तो इससे अच्छा है कि वे शादी में पैसे लगाएं लेकिन अब अकाल के चलते पैसों की इतनी कमी हो गई है कि मेरी शादी ही टूट गई.’पानी भरने की कतार में लगी हुई सोनाली राठौड़ बताती हैं, ‘मेरी चचेरी बहन की शादी तय तारीख से दो दिन पहले टूट गई थी. चाचा ने दो लाख रुपये का कर्जा उठाया था, अपनी जमीन भी बेच दी थी और खुद के पास जमा सारे पैसे शादी की तैयारियों में लगा दिए थे लेकिन फिर लड़केवालों ने 12 लाख रुपये की रकम की मांग कर दी जिसके चलते शादी टूट गई.’

मराठवाड़ा के किसान बेटियों की शादी करवाने के दौरान अक्सर कर्जदार हो जाते हैं. 20 जनवरी को लातूर जिले के भिसे वाघोली गांव की मोहिनी भिसे ने इसलिए आत्महत्या कर ली थी कि उनके पिता को शादी के लिए कर्ज न लेना पड़े. उन्होंने अपने सुसाइड नोट में दहेज प्रथा को अपनी आत्महत्या का कारण बताया था. भिसे वाघोली गांव में रहने वाले सत्तार पटेल मोहिनी के परिवार से परिचित हैं. वे किसानों के लिए काम करने वाले बलिराजा शेतकरी संगठन के मुखिया हैं. उनका कहना है, ‘मोहिनी के माता-पिता बेटी की शादी के लिए अपनी जमीन बेच रहे थे. वह नहीं चाहती थी कि उसका परिवार भूमिहीन हो जाए इसलिए उसने आत्महत्या कर ली थी. अब तक तो सिर्फ किसान आत्महत्या कर रहे थे लेकिन अब उनके परिवार के सदस्य आत्महत्या कर रहे हैं, यह स्थिति बेहद चिंताजनक है.

’मानव तस्करी 

मानव तस्करी के खिलाफ काम करने वाली गैर-सरकारी संस्था स्नेहालय के अध्यक्ष गिरीश कुलकर्णी ने बताया, ‘सूखे के चलते किशोर लड़कियों की तस्करी का खतरा बढ़ गया है. मराठवाड़ा से इतने बड़े स्तर पर पलायन हो रहा है कि ऐसे में आपराधिक तत्वों के लिए उनका शोषण करना आसान हो गया है.’ कुलकर्णी और उनका संगठन केतन तिरोडकर के जिलों में पलायन करके आए लोगों को मानव तस्करी के खतरे के प्रति जागरूक कर रहे हैं. उन्होंने अहमदनगर स्थित स्नेहालय में तकरीबन 150 किशोर-किशोरियों के रहने का बंदोबस्त भी किया है. वे कहते हैं, ‘शहर पहुंचने के बाद इन लोगों के पास रहने तक की जगह नहीं होती, पैसे नहीं. होते ऐसे में मानव तस्कर काम दक़िलाने के बहाने इन्हें बहला-फुसलाकर वेश्यावृत्ति के धंधे में झोक देते हैं. इनका निशाना ज्यादातर किशोरियां होती हैं. मुंबई के कमाठीपुरा इलाके में वेश्यावृत्ति करने वाली मराठी मूल की अधिकांश लड़कियां मराठवाड़ा से हैं. सूखे की वजह से सामाजिक दुष्परिणाम का यह एक जीता-जागता उदाहरण है.’किसानों के हक के लिए लड़ने वाले और मौजूदा प्रदेश सरकार द्वारा सूखे से निपटने के लिए गठित वसंतराव नाईक शेती स्वावलंबन मिशन के निदेशक किशोर तिवारी कहते हैं, ‘गन्ने की कटाई करने वाले मजदूरों की स्थिति अमेरिका में अफ्रीकी मूल के लोगों की दासता की याद दिलाती है. इन मजदूरों की यह स्थिति का कारण शुगर मिल चला रहे नेताओं का सामंतवाद है. इन मिलों को बंद करना चाहिए. इन लोगों की वजह से सूखे की स्थिति और खराब हो जाती है. ऐसे लोगों को फांसी दे देनी चाहिए. भूमिहीन मजदूर हो या किसान अगर वह आत्महत्या करता है तो उसके परिवार को मुआवजा मिलना चाहिए. हर सरकार उनके हालात ठीक करने की बात करती है लेकिन कोई कुछ नहीं करता.’ तिवारी ने बताया कि इन मुद्दों पर वे मुख्यमंत्री के साथ होने वाली समीक्षा बैठक में चर्चा करेंगे.महाराष्ट्र की ग्रामीण विकास और जल संरक्षण मंत्री पंकजा मुंडे से बातचीत में कहती हैं, ‘प्रदेश सरकार द्वारा शुरू की गई जलयुक्त शिविर योजना पानी  संरक्षित करने की अच्छी पहल है. इसका फायदा जुलाई में जब बारिश शुरू होगी तब दिखेगा. इससे सूखे से निजात मिलेगी और मराठवाड़ा में जीवन फिर से पटरी पर आ जाएगा. पानी भरने की समस्या से निजात मिलने के साथ किसान आत्महत्या भी रुक जाएगी.’

लोकसभा सांसद व् स्वाभिमानी शेतकरी संघटन से जुड़े  राजू शेट्टी कहते हैं, ‘सरकार को सभी किसानों का कर्ज माफ कर देना चाहिए. इस मांग को लेकर हमने  नौ मई को देश भर में आंदोलन किया. जब सरकारी बैंक रईस उद्योगपतियों के एक लाख चौदह हजार करोड़ रुपये का कर्ज छोड़ सकते हैं तो गरीब किसानों का छोटा-सा कर्ज क्यों माफ नहीं करते? विजय माल्या जैसा व्यक्ति बैंकों का 9000 करोड़ का कर्जा चुकाए बिना लंदन भाग जाता है लेकिन एक गरीब किसान 50,000 रुपये का कर्ज न चुका पाने के कारण आत्महत्या कर लेता है.’ 

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