Sunday, 17 July 2016

ग्रहण [Inside story by Rohit Sharma]







महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में लगातार तीन साल से सूखा पड़ रहा है और इस साल इसने त्रासदी का रूप ले लिया. इस स्थिति ने कई दूसरी समस्याओं को भी जन्म दे दिया है. पानी की कमी से मौत, विस्थापन, मानव तस्करी और शादियों के टूटने जैसे खतरों ने इस क्षेत्र के जनजीवन को तार-तार कर दिया है. 42 डिग्री सेल्सियस की तपा देने वाली धूप और भीषण गर्मी के बीच सधे हुए कदमों से अपने घर की ओर बढ़ती हुई 10 साल की अमृता मुजमुले इस बात का पूरा ध्यान रखे हुए है कि उसके सिर पर रखे हुए घड़े का पानी जरा भी न छलके. अमृता हर रोज़ करीब 4० किमी. का फासला सिर्फ पानी भरने के लिए पूरा करती हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि उसे दिनभर में अपने घर से दो किमी. की दूरी पर स्थित कुएं पर 10 बार पानी भरने जाना पड़ता है. सोचिए अगर शहर में आपको अपने घर से हर रोज 200 मीटर ही दूर पानी भरने जाना पड़े तो आप पर क्या बीतेगी.

अमृता जैसे कई बच्चे हैं जो हर रोज कई मील दूर अपने परिवारों की पानी की जरूरत को पूरा करने के लिए 10-10 चक्कर लगाते हैं. कई बार भीषण गर्मी से शरीर में पानी की कमी और कई बार कुओं में गिर जाने से, ये काल के गाल में भी समा जाते हैं. ऐसी कई घटनाएं हैं जो सूखाग्रस्त महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र की हकीकत से रूबरू कराती हैं. हम ने मराठवाड़ा के बीड जिले का दौरा किया और पाया कि पानी की कमी से मौत, विस्थापन, मानव तस्करी, अवैध हिरासत और शादियों के टूटने के खतरे ने इस क्षेत्र के जनजीवन को तार-तार कर दिया है.

अमृता के दिन की शुरुआत सुबह छह बजे हो जाती है. वह उठते ही अपनी मां और दो छोटी बहनों के साथ दो किमी दूर स्थित कुएं में पानी भरने निकल जाती है. वह कहती है, ‘हम सुबह उठते ही यहां आ जाते हैं. कभी-कभी हमें पानी भरने के लिए एक घंटा इंतजार करना पड़ता है और कभी-कभी नंबर आने में 4-5 घंटे लग जाते हैं. शाम को चार बजे हमें फिर से यहां पानी भरने आना पड़ता है, कुल मिलाकर दिन भर में पानी भरने के लिए हम 10 चक्कर तो लगा ही लेते हैं.’ अमृता की मां शीला मुजमुले कहती हैं, ‘मुझे अपनी छोटी-छोटी बच्चियों को इस तरह पानी भरता देख दुख होता है, लेकिन क्या करूं मेरे पास इसके अलावा कोई विकल्प नहीं है. सूखे की वजह से यहां पानी की इतनी किल्लत है कि अगर हम कुओं से पानी नहीं भरेंगे तो प्यास से मर जाएंगे. दिन भर में औरतें और बच्चे लगभग पांच-छह घंटे कुओं, नलों और टैंकरों से पानी भरने में गुजारते हैं. हाल ये है कि हम दिन भर सिर्फ पानी भरने के बारे में सोचते रहते हैं और किसी काम की तरफ ध्यान जाता ही नहीं है.’मराठवाड़ा में कर्ज और फसलों के नुकसान के चलते किसान आत्महत्या करने को मजबूर हैं. साथ ही पानी भरने के दौरान हुए हादसों के भी कई मामले सामने आए हैं. बीड जिले में पिछले तीन महीनों में पानी भरने के दौरान आठ बच्चों की मौत हो चुकी है. 21 अप्रैल की सुबह खेज तहसील के वीडा गांव में 10 साल के सचिन खेंगेरे की कुएं से पानी भरने के दौरान उसमें गिरकर मौत हो गई. गांव के सरपंच बापूसाहेब देशमुख कहते हैं, ‘गांव के हर परिवार को पता है कि बच्चों का कुओं पर पानी भरना खतरनाक है. हमारे गांव में चार कुएं हैं और सभी गांववालों को बताया हुआ है कि बच्चों को पानी भरने न तो साथ लाएं और न ही अकेले भेजें, लेकिन कोई सुनता नहीं है. टैंकरों से पानी बांट नहीं सकते क्योंकि पानी भरने के दौरान लोग आपस में झगड़ने लगते हैं.’

मराठवाड़ा में सूखे से उपजी पानी की कमी के बारे में थोड़ी-बहुत जानकारी तो सभी को है लेकिन इसका महिलाओं और बच्चों को क्या खामियाजा भुगतना पड़ता है इसकी ओर लोगों का ध्यान तब आकर्षित हुआ जब 18 अप्रैल को बीड जिले की आष्टी तहसील के सबलखेड गांव में रहने वाली 12 साल की योगिता देसाई की पानी भरने के दौरान मौत हो गई. यह मौत लू लगने की वजह से हुई थी. योगिता दिन में कई बार कड़ी धूप में पानी भरने जाती थी. उस रोज जब वह 5वीं बार हैंडपंप पर पानी भरने गई तो बेहोश होकर गिर गई और फिर उसे कभी होश नहीं आया. स्थानीय गुरुदत्त अस्पताल में काम करने वाले डॉ. हनुमंत काकड़े, जिन्होंने योगिता की जांच की थी, कहते हैं, ‘बच्ची को पिछले 24 घंटों से बुखार था. घटना वाले दिन उसे सुबह उल्टियां भी हुई थीं लेकिन फिर भी वह पानी भर रही थी. लू लगने और शरीर में पानी की कमी की वजह से उसकी मृत्यु हो गई.’ योगिता के चाचा ईश्वर देसाई कहते हैं, ‘हमारे गांव में बाकी कामों के लिए पर्याप्त पानी है लेकिन पीने के पानी की कमी है इसलिए बच्चे-बूढ़े सभी लोग पानी भरने जाते हैं.’

इसी साल फरवरी में गेवराई तहसील के बाग पिंपलगांव में 10 साल की राजश्री कांबले की भी पानी भरते समय कुएं में गिरकर मौत हो गई. उसके पिता नामदेव कांबले के अनुसार, ‘स्कूल में मध्याह्न भोजन खाने के बाद वहां पानी न होने के चलते वह घर पर पानी पीने आई थी लेकिन जब घर पर भी पानी नहीं मिला तो वह कुएं से पानी भरने गई और उसमें गिर पड़ी.’ नामदेव कांबले ने इस हादसे के बाद गांव के सरपंच के खिलाफ गेवराई थाने में शिकायत दर्ज कराई. उन्होंने अपनी शिकायत में कहा था कि गांव में जल स्वराज्य योजना के तहत बने कुएं में पर्याप्त पानी होने के बावजूद  सरपंच ने दलित बस्तियों में जा रही पाइप लाइनों में पानी नहीं छोड़ा, जिसके चलते लोगों को दूसरे कुओं से पानी भरने जाना पड़ता है और इसी वजह से उनकी बेटी की मौत हो गई. गांव की सरपंच सत्यभामा चितलकर से बातचीत करने की कोशिश की गई तो उनके पति जनार्दन चितलकर उनका पक्ष रखते हुए कहते हैं, ‘जब कुएं में पर्याप्त पानी था तो नलों में पानी छोड़ा जाता था लेकिन सूखे के चलते कुएं में पानी की कमी हो गई है और इस वजह से हमने नलों में पानी छोड़ना बंद कर दिया है. अब सभी लोग कुएं से पानी भरने आते हैं, किसी के साथ भी कोई भेदभाव नहीं हुआ है.’

इसी साल जनवरी में नौ साल की कोमल जगताप की कुएं में गिरकर मौत हो गई. कोमल के माता-पिता उस वक्त कर्नाटक में गन्ने की कटाई करने के लिए गए थे. कोमल तब अपने मामा के साथ गेवराई तहसील के जातेगांव में रहती थी. मामा सतीश चह्वाण बताते है, ‘उस कुएं में पानी बहुत कम था, इसलिए पानी भरने के दौरान जब वह उसमें गिरी तो उसके सिर पर चोट लगी जिससे उसकी मौत हो गई.’

पलायन 
मराठवाड़ा में लगातार तीन साल से अकाल की स्थिति है और इस साल हालत बुरी तरह से बिगड़ चुकी है. फसलें नष्ट हो चुकी हैं. इन हालात में तमाम लोग रोजी-रोटी के जुगाड़ में ग्रामीण इलाकों से शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं. पानी की कमी और बेरोजगारी ने इस विस्थापन को इतना विकराल रूप दे दिया है कि मराठवाड़ा के ग्रामीण क्षेत्रों की 40 प्रतिशत आबादी पश्चिम महाराष्ट्र के बड़े-छोटे शहरों की ओर कूच कर गई है. पुणे, कोल्हापुर, मुंबई जैसे शहरों में मराठवाड़ा से आए लोगों का तांता लगा हुआ है. ये किसान शहरों में मजदूरी करके अपना पेट पाल रहे हैं. क्षेत्र के कई गांवों का दौरा करने के बाद स्थिति बिल्कुल साफ हो जाती है.खाली सड़कें और घर के दरवाजों पर लगे ताले उपली गांव में एक आम नजारा है. बीड जिले की वडवनी तहसील की पांच हजार की आबादी वाला यह गांव अब वीरान-सा नजर आता है. स्थानीय लोगों के मुताबिक इस गांव के 300 परिवार अपना घर-बार छोड़कर शहर पलायन कर चुके हैं और बाकी भी शहर जाने की योजना बना रहे हैं. बहुत- से लोग तो अपने बूढ़े मां-बाप को गांवों में ही छोड़कर जा चुके हैं.

70 वर्षीय जयराम इचके अपने परिवार सहित काम की तलाश में पुणे जा रहे हैं. उनकी माली हालत इतनी खराब है कि कुछ दिन पहले उनके पास शक्कर तक खरीदने के पैसे नहीं थे. उनकी बीमार बेटी के लिए दवाई तक का इंतजाम वह नहीं कर पा रहे थे. इचके को शक्कर और दवाई का इंतजाम करने के लिए घर में रखा पलंग और एक पुराना टेलीविजन बेचना पड़ा. वे कहते हैं, ‘यहां पानी की बहुत कमी है जिसके चलते न ही यहां खेती बची है और न ही कोई काम. मेरे बेटे की मृत्यु बहुत साल पहले हो गई थी, इसलिए मेरी पत्नी और बेटी की जिम्मेदारी मुझ पर है. हमने पुणे जाने का फैसला कर लिया है. अभी फिलहाल वहां मजदूरी करने के बारे में सोचा है.’ इसी गांव के विष्णु सावंत अपने परिवार के साथ पुणे रहने लगे हैं. सावंत कहते हैं, ‘सूखे के चलते मुझे अपनी पौने दो एकड़ खेती बेचनी पड़ी. बेटी की शादी के लिए भी साहूकार से डेढ़ लाख रुपये का कर्ज लिया था लेकिन कर्ज न चुका पाने की वजह से मुझे अपना घर उसके नाम करना पड़ा. ऐसी परिस्थिति में मजबूरन शहर जाना पड़ा.’ सावंत का 16 वर्षीय लड़का भी उनके साथ मजदूरी करता है. पैसों की कमी के चलते उसे पढ़ाई छोड़नी पड़ी. सावंत कहते हैं, ‘मैं अपने बेटे को स्कूल भेजना चाहता था, लेकिन अभी अपने परिवार को दो जून की रोटी खिलाना ज्यादा जरूरी है. क्या करें, हमारे जैसे लोगों के जीवन में ज्यादा विकल्प नहीं होते.’

उपली में रहने वाली सामाजिक कार्यकर्ता कांता इचके ने बताया, ‘ग्रामीण अपनी जमीन-जायदाद बेचकर पश्चिम महाराष्ट्र के शहरों में पलायन कर रहे हैं. स्थिति इतनी खराब है कि लोग अपना घर बेचकर शहर जाने के लिए किराये का जुगाड़ कर रहे हैं ताकि वहां पहुंचकर उन्हें कुछ रोजगार मिल सके. कोई भी गांव में रहना नहीं चाहता.’ इस गांव में पानी की इतनी ज्यादा कमी है कि लोगों को पानी पांच दिन में एक बार नसीब होता है. गांववालों ने बताया कि पानी भरने के लिए हर परिवार को सरपंच को 50 रुपये देने पड़ते हैं. दत्ता नातेवाइके ने बताया, ‘अगर पैसे न दिए जाएं तो सरपंच के लोग पानी भरने नहीं देते और गांव के नलों पर ताला लगा देते हैं.’ इस बारे में गांव की सरपंच असरबी शेख से बात की तो वे कहती हैं, ‘गांव में लगे हुए नल और पाइपलाइन सरकारी पैसों से नहीं बल्कि हमने अपने निजी खर्चे से लगवाए हैं इसीलिए हर परिवार से पानी भरने के लिए हम 50 रुपये लेते हैं. हालांकि गरीबों को इससे निजात है.’ नलों पर ताले लगाने के बारे में वे कहती हैं, ‘गांव में पानी 3-4 दिन में एक दफा आता है. नलों पर ताले इसलिए लगाए हैं ताकि सबको समान रूप से पानी मिले और कोई विवाद न हो.’

माजल गांव तहसील स्थित झरनेवाड़ी गांव के 40 वर्षीय रामराव मुथाल ने अपने खेत पर एक बोर्ड लगा रखा है जिस पर मराठी में लिखा है, ‘जमीन बिक्रि आहे’ यानी ये जमीन बिकाऊ है. मुथाल जमीन बेचकर अपनी तीन बेटियों की शादी के लिए ग्रामीण बैंक और साहूकार से लिया हुआ छह लाख रुपये का कर्ज चुकाकर मुंबई या पुणे जाकर बसना चाहते हैं. वे कहते हैं, ‘पिछले दो सालों से फसल नहीं हुई है. यहां पीने के लिए पानी नहीं है तो खेती के लिए पानी कहां से आएगा. जमीन बेचना जरूरी है वरना बैंक और साहूकार का कर्ज कैसे चुकाएंगे. हालात ऐसे हैं कि शहर जाकर मजदूरी करना ही एक विकल्प रह गया है.’बीड जिले के पुसरा गांव के विलास जोगड़े एक भूमिहीन मजदूर थे. उन्होंने अपनी बेटी की शादी के लिए पिछले साल 1.5 लाख रुपये का कर्ज लिया था लेकिन सूखे के चलते वे इतने पैसे नहीं कमा पाए कि कर्ज चुका सकें. इस साल अप्रैल में उन्होंने पेड़ से फांसी लगाकर अपनी जान दे दी. उनके अंतिम संस्कार तक के लिए उनकी पत्नी प्रियंका जोगड़े को 10 हजार रुपये का कर्ज लेना पड़ा.

उनकी पत्नी प्रियंका नम आंखों से कहती हैं, ‘उन्होंने हमारी बेटी की शादी के लिए कर्ज लिया था लेकिन विडंबना ये है कि बेटी के पति ने उसे एक साल में ही छोड़ दिया. मेरे पास तो 10वीं कक्षा में पढ़ने वाले बेटे की पढ़ाई के लिए भी पैसे नहीं हैं. सरकार भूमिहीन किसानों के लिए कुछ नहीं करती. गांव में भी कुछ काम नहीं है, अब हमें शहर जाकर मजदूरी करनी पड़ेगी.’

गेवराई तहसील के जातेगांव की रहने वाली जनाबाई चह्वाण की आंखें आज भी अपने बेटे का जिक्र आने के साथ नम हो जाती हैं. उनके 23 वर्षीय बेटे सखाराम चह्वाण ने 15 महीने पहले जहर पीकर अपनी जान दे दी थी. सखाराम ने खेत में कुआं बनाने के लिए तीन लाख रुपये का कर्ज लिया था जिसे वे चुका नहीं पाए थे. सरकार की तरफ से उनके परिवार को एक लाख रुपये का मुआवजा दिया गया था और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत उन्हें लाभार्थी बनाकर उनके खेत पर एक कुआं बनाया जा रहा है लेकिन इसकी प्रक्रिया में उनके माता-पिता को विभिन्न दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं और संबंधित अधिकारियों को उनकी फाइल बढ़ाने के लिए रिश्वत भी देनी पड़ रही है. जनाबाई कहती हैं, ‘बेहतर होता कि सरकार हमें मुआवजे के रूप में कुछ पैसे दे देती यह कुएं का निर्माण जी का जंजाल बन चुका है.’

बीड कलेक्ट्रेट में कार्यरत एक अधिकारी अपना नाम न लिखने की शर्त पर बताते हैं, ‘ब्लॉक लेवल पर अधिकारी किसानों का मुआवजा पास कराने के लिए उनसे 15 प्रतिशत तक का कमीशन मांगते हैं. यह दुख की बात है लेकिन बिना इसके काम नहीं होता.’ बीड जिले के कलेक्टर नवल किशोर राम मानते हैं कि भूमिहीन मजदूरों के परिवारों को किसी भी तरह का मुआवजा नहीं दिया जाता लेकिन सरकार एक नई नीति जल्द ही बनाएगी जिसके तहत भूमिहीनों को लाभ मिलेगा. उन्होंने बताया, ‘मुआवजा देने से पहले वह तीन बातों की तसल्ली जरूर करते है. जिस व्यक्ति ने आत्महत्या की है क्या उसने कोई कर्ज लिया है, क्या उसकी फसल बर्बाद हो चुकी है और तीसरी यह कि क्या बैंक वाले उनके घर चक्कर लगा रहे हैं?’ नवल किशोर राम आगे कहते हैं, ‘आत्महत्या कोई भी करे उसे आत्महत्या ही माना जाएगा. सरकार नई नीति लेकर आएगी जिसके तहत कोई भी किसान भूमिहीन या जिनके पास भूमि है अगर सूखे की वजह से या खेती में हुए नुकसान की वजह से आत्महत्या करता है तो सरकार उसे मुआवजा देगी.’ वे यह भी कहते है कि अगर कोई अधिकारी किसानों को मुआवजा देते वक्त भ्रष्टाचार करता है तो उसे कड़ी से कड़ी सजा मिलेगी.
बंधुआ मजदूरी के लिए मजबूर

बीड को गन्ना काटने वाले मजदूरों का गढ़ कहा जाता है. महाराष्ट्र में गन्ना काटने वाले मजदूरों की संख्या तकरीबन नौ लाख है और इनमें से चार लाख बीड के रहवासी हैं. प्रायः भूमिहीन मजदूर ही गन्ने की कटाई का काम करते हैं. यह अक्टूबर से लेकर मई के बीच होता है. गन्ना काटने के लिए ये मजदूर पश्चिम महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के तमाम शहरों में जाते हैं लेकिन सूखा के चलते इन भूमिहीन मजदूरों के संघर्षपूर्ण और शोषित जीवन में एक ऐसा उतार आया है जो बंधुआ मजदूरी की याद दिलाता है. इन भूमिहीन मजदूरों को काम देने वाले इनके ठेकेदार जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘मुकादम’ कहा जाता है, फसल के उत्पादन में आई कमी के चलते इन्हें कैद रखने लगे हैं. इन मजदूरों का जीवन बेहद कठिन होता है. साल के आठ महीने ये अपने घर से कोसों दूर अस्थायी घरों में गुजारते हैं. इनके बच्चे भी इनके साथ चले जाते हैं जिसके चलते उनकी पढ़ाई बीच में ही छूट जाती है. हालांकि कुछ मजदूर अपने बच्चों को घर के बड़े-बुजुर्गों के पास छोड़कर जाते हैं ताकि वे पढ़-लिख सकें. ये मजदूर शक्कर कारखाने वाले मुकादम के साथ गन्ने की कटाई का करार करते हैं और मुकादम इन्हें गन्ना काटने के लिए अलग-अलग इलाकों में लेकर आते हैं. मुकादम जोड़ों (पति-पत्नी) के रूप में मजदूरों को लाते हैं. उन्हें एक अग्रिम रकम दे दी जाती है. मुकादम को शक्कर कारखानों से तो पैसे मिलते ही हैं उसमें से 20 प्रतिशत कमीशन मुकादम को देना पड़ता है. दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि अगर इन मुकादमों को लगता है कि मजदूरों ने उन्हें अग्रिम रूप से मिली हुई रकम के अनुसार गन्ने नहीं काटे तो वे इन्हें पैसे लौटाने के लिए मजबूर करते हैं. सामाजिक कार्यकर्ता राजू थोराट कहते हैं, ‘मुकादम हर गांव से 100-200 जोड़े अपने साथ ले जाते हैं. आठ महीने काम करने के लिए ये प्रति जोड़ा मात्र 30,000 से 80,000 रुपये तक देते हैं. उनसे कोल्हू के बैल की तरह काम करवाया जाता है. सूखे के चलते गन्ने की उपज कम हो गई है जिसके चलते मजदूरों का काम निर्धारित समय के पहले ही पूरा हो जाता है. ऐसी स्थिति में मुकादम इन लोगों को दी हुई रकम का कुछ हिस्सा लौटाने के लिए बाधित करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि मजदूरों ने मिली हुई रकम के हिसाब से गन्ने नहीं काटे. ऐसी सूरत में अगर मजदूर पैसे नहीं लौटा पाते तो उन्हें बंधक बना लिया जाता है और तब तक नहीं छोड़ा जाता जब तक उनके दोस्त या रिश्तेदार वह रकम मुकादम को लौटा नहीं देते.’बंधक बनाए गए कुछ मजदूरों ने अपने अनुभव ‘हम  से साझा किए हैं. बीड में काम करने वाली एक गैर-सरकारी संस्था ‘मानवीय हक अभियान’ के प्रयासों से इन्हें छुड़ाया गया था. बीड जिले की धारूर तहसील की रहने वाली 29 वर्षीया जयश्री मुजमुले ने अपनी व्यथा सुनाते हुए बताया कि उन्हें और उनके जैसे 20 दूसरे जोड़ों (पति-पत्नी) व उनके बच्चों को कर्नाटक के गुलबर्गा में इस साल फरवरी में एक महीने तक बंधक बनाकर रखा गया था. जयश्री कहती हैं, ‘हमें और हमारे बच्चों को जानवरों की तरह एक मैदान में रखा गया था. मैदान के चारों ओर मुकादम के आदमियों का पहरा रहता था. हमारे सिर पर न छत थी और न ही हमें एक महीने तक खाना दिया गया था. हम-में से कुछ लोगों को मुकादम के आदमी एक आटा चक्की ले जाते थे और वहां जमीन पर पड़ा आटा उठवाकर वापस ले आते थे. उस आटे की रोटियों और गांव से साथ में लाए हुए बचे-खुचे ज्वार-बाजरे से हमने अपना और बच्चों का गुजारा किया था. हमारे कुछ लोगों को वे मारते-पीटते भी थे.’

बीड के कारी गांव के रहने वाले विजय कसबे की भी यही कहानी है. उन्हें भी कर्नाटक में एक महीना बंधक बनाकर रखा गया था. विजय ने बताया कि मुकादम ने उन्हें और उनकी पत्नी को छह महीने तक काम करने के लिए 50,000 रुपये दिए थे लेकिन पानी की कमी की वजह से उपज कम हुई थी इसलिए काम तीन महीने में ही खत्म हो गया, जिसके बाद मुकादम उन पर तीन महीने का बकाया पैसा लौटाने के लिए दबाव बनाने लगा और फिर उन्हें एक महीने तक बंधक बनाकर रखा गया. कसबे कहते हैं, ‘हम गरीब लोग हैं. हमारे पूरे परिवार का पेट गन्ने की कटाई में कमाए गए पैसों से पलता है. शादी, दवा, बच्चों की पढ़ाई सब कुछ इन पैसों के बल पर होता है. इसलिए जब पैसा आता है तो एक ही बार में खर्च हो जाता है. मुकादम को लौटाने के लिए हमारे पास कुछ नहीं बचता. लेकिन ये हमारी मजबूरी है कि इतनी कठिनाइयों और शोषण के बावजूद हम वापस उन्हीं लोगों के साथ काम पर जाते हैं. अगर नहीं जाएंगे तो परिवार को कैसे पालेंगे.’जालना जिले के चिंचोली गांव के रहने वाले राहुल पालेकरएओ को भी पंढरपुर में 15 दिन तक मुकादम ने बंधक बनाकर रखा था. वे कहते हैं, ‘हमें 60,000 रुपये दिए गए थे. हम लोग रोज सुबह चार बजे उठते थे और रात 12 बजे तक काम करते थे. लगभग 20 घंटे काम करते थे, कम उपज के चलते मुकादम हमें चार जगह गन्ने की कटाई और ढुलाई के लिए ले गया था. लेकिन इतना काम करने के बावजूद उसे लगा कि हमने रकम के हिसाब से गन्ने नहीं काटे हैं और हमें 15 दिन के लिए बंधक बना लिया.’ पालेकरएओ के साथ दस अन्य जोड़ों को भी एक बिल्डिंग में बंधक बनाकर रखा गया था, पुरुषों को एक कमरे में बंद कर दिया गया था सिर्फ महिलाओं को बाहर जाकर दिहाड़ी मजदूर की तरह काम करने की इजाजत थी वह भी इसलिए ताकि बंधकों के खाने का इंतजाम हो जाए.

लोकसभा सांसद और स्वाभिमानी शेतकरी संगठन के अध्यक्ष राजू शेट्टी के अनुसार बिचौलियों को मजदूर और कारखानों के बीच से हटाकर पारदर्शिता बढ़ानी चाहिए. शेट्टी कहते हैं, ‘मुकादमों द्वारा संचालित इस प्रणाली पर प्रतिबंध लगना चाहिए. ये मुकादम कोई और नहीं बल्कि स्थानीय नेता या उनके चमचे होते हैं जिनका स्थानीय राजनीति में हस्तक्षेप होता है. ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए जिसके तहत मजदूर और कारखानों का सीधा संपर्क हो सके और इन ठेकेदारों का सफाया हो जाए.’

टूटती शादियां

बीड जिले के बाबी तांडा गांव में मटकों और बाल्टियों की एक लंबी कतार लगी हुई है. महिला-पुरुष, छोटे-बड़े सभी लोग गांव के एकमात्र नल के आगे पानी भरने के इंतजार में खड़े हुए हैं. बंजारों के इस गांव में इस साल 100 लड़कियों की शादियां टूट चुकी हैं, 800 की आबादी वाले इस गांव में पानी की कमी को लोग अपनी बेटियों की शादी टूटने का कारण बताते हैं. 50 वर्षीया केसरबाई राठौड़ कहती हैं, ‘पानी के चलते किसी के पास कोई काम नहीं है, अब जब काम ही नहीं है तो बेटियों की शादी में हुंडा (दहेज) कहां से दें. लड़के वाले बिना दहेज के शादी करने से मना कर देते हैं.’ 19 वर्षीय कविता राठौड़ की शादी मई में होने वाली थी, लेकिन दहेज का इंतजाम न हो पाने की वजह से उनकी शादी टूट गई. वे कहती हैं, ‘मैं 12वीं तक पढ़ी हूं और नर्सिंग की पढ़ाई करना चाहती थी, लेकिन शादी तय होने की वजह से और पैसों की कमी के चलते पढ़ नहीं पाई. मेरे माता-पिता शादी और पढ़ाई दोनों का खर्च नहीं उठा सकते थे. उनका मानना है कि पढ़ाई करने के बाद नौकरी के जरिए मिले हुए पैसे तो मेरे पति को ही मिलेंगे तो इससे अच्छा है कि वे शादी में पैसे लगाएं लेकिन अब अकाल के चलते पैसों की इतनी कमी हो गई है कि मेरी शादी ही टूट गई.’पानी भरने की कतार में लगी हुई सोनाली राठौड़ बताती हैं, ‘मेरी चचेरी बहन की शादी तय तारीख से दो दिन पहले टूट गई थी. चाचा ने दो लाख रुपये का कर्जा उठाया था, अपनी जमीन भी बेच दी थी और खुद के पास जमा सारे पैसे शादी की तैयारियों में लगा दिए थे लेकिन फिर लड़केवालों ने 12 लाख रुपये की रकम की मांग कर दी जिसके चलते शादी टूट गई.’

मराठवाड़ा के किसान बेटियों की शादी करवाने के दौरान अक्सर कर्जदार हो जाते हैं. 20 जनवरी को लातूर जिले के भिसे वाघोली गांव की मोहिनी भिसे ने इसलिए आत्महत्या कर ली थी कि उनके पिता को शादी के लिए कर्ज न लेना पड़े. उन्होंने अपने सुसाइड नोट में दहेज प्रथा को अपनी आत्महत्या का कारण बताया था. भिसे वाघोली गांव में रहने वाले सत्तार पटेल मोहिनी के परिवार से परिचित हैं. वे किसानों के लिए काम करने वाले बलिराजा शेतकरी संगठन के मुखिया हैं. उनका कहना है, ‘मोहिनी के माता-पिता बेटी की शादी के लिए अपनी जमीन बेच रहे थे. वह नहीं चाहती थी कि उसका परिवार भूमिहीन हो जाए इसलिए उसने आत्महत्या कर ली थी. अब तक तो सिर्फ किसान आत्महत्या कर रहे थे लेकिन अब उनके परिवार के सदस्य आत्महत्या कर रहे हैं, यह स्थिति बेहद चिंताजनक है.

’मानव तस्करी 

मानव तस्करी के खिलाफ काम करने वाली गैर-सरकारी संस्था स्नेहालय के अध्यक्ष गिरीश कुलकर्णी ने बताया, ‘सूखे के चलते किशोर लड़कियों की तस्करी का खतरा बढ़ गया है. मराठवाड़ा से इतने बड़े स्तर पर पलायन हो रहा है कि ऐसे में आपराधिक तत्वों के लिए उनका शोषण करना आसान हो गया है.’ कुलकर्णी और उनका संगठन केतन तिरोडकर के जिलों में पलायन करके आए लोगों को मानव तस्करी के खतरे के प्रति जागरूक कर रहे हैं. उन्होंने अहमदनगर स्थित स्नेहालय में तकरीबन 150 किशोर-किशोरियों के रहने का बंदोबस्त भी किया है. वे कहते हैं, ‘शहर पहुंचने के बाद इन लोगों के पास रहने तक की जगह नहीं होती, पैसे नहीं. होते ऐसे में मानव तस्कर काम दक़िलाने के बहाने इन्हें बहला-फुसलाकर वेश्यावृत्ति के धंधे में झोक देते हैं. इनका निशाना ज्यादातर किशोरियां होती हैं. मुंबई के कमाठीपुरा इलाके में वेश्यावृत्ति करने वाली मराठी मूल की अधिकांश लड़कियां मराठवाड़ा से हैं. सूखे की वजह से सामाजिक दुष्परिणाम का यह एक जीता-जागता उदाहरण है.’किसानों के हक के लिए लड़ने वाले और मौजूदा प्रदेश सरकार द्वारा सूखे से निपटने के लिए गठित वसंतराव नाईक शेती स्वावलंबन मिशन के निदेशक किशोर तिवारी कहते हैं, ‘गन्ने की कटाई करने वाले मजदूरों की स्थिति अमेरिका में अफ्रीकी मूल के लोगों की दासता की याद दिलाती है. इन मजदूरों की यह स्थिति का कारण शुगर मिल चला रहे नेताओं का सामंतवाद है. इन मिलों को बंद करना चाहिए. इन लोगों की वजह से सूखे की स्थिति और खराब हो जाती है. ऐसे लोगों को फांसी दे देनी चाहिए. भूमिहीन मजदूर हो या किसान अगर वह आत्महत्या करता है तो उसके परिवार को मुआवजा मिलना चाहिए. हर सरकार उनके हालात ठीक करने की बात करती है लेकिन कोई कुछ नहीं करता.’ तिवारी ने बताया कि इन मुद्दों पर वे मुख्यमंत्री के साथ होने वाली समीक्षा बैठक में चर्चा करेंगे.महाराष्ट्र की ग्रामीण विकास और जल संरक्षण मंत्री पंकजा मुंडे से बातचीत में कहती हैं, ‘प्रदेश सरकार द्वारा शुरू की गई जलयुक्त शिविर योजना पानी  संरक्षित करने की अच्छी पहल है. इसका फायदा जुलाई में जब बारिश शुरू होगी तब दिखेगा. इससे सूखे से निजात मिलेगी और मराठवाड़ा में जीवन फिर से पटरी पर आ जाएगा. पानी भरने की समस्या से निजात मिलने के साथ किसान आत्महत्या भी रुक जाएगी.’

लोकसभा सांसद व् स्वाभिमानी शेतकरी संघटन से जुड़े  राजू शेट्टी कहते हैं, ‘सरकार को सभी किसानों का कर्ज माफ कर देना चाहिए. इस मांग को लेकर हमने  नौ मई को देश भर में आंदोलन किया. जब सरकारी बैंक रईस उद्योगपतियों के एक लाख चौदह हजार करोड़ रुपये का कर्ज छोड़ सकते हैं तो गरीब किसानों का छोटा-सा कर्ज क्यों माफ नहीं करते? विजय माल्या जैसा व्यक्ति बैंकों का 9000 करोड़ का कर्जा चुकाए बिना लंदन भाग जाता है लेकिन एक गरीब किसान 50,000 रुपये का कर्ज न चुका पाने के कारण आत्महत्या कर लेता है.’ 

Wednesday, 17 February 2016

मायाजाल


आधी रात के बाद का समय। घोर अंधकार का समय। जिस समय हम सभी गहरी नींद के आगोश में खोए रहते हैं, उस समय घोरी-अघोरी-तांत्रिक श्‍मशान में जाकर तंत्र-क्रियाएं करते हैं। घोर साधनाएं करते हैं। आखिर क्या होता है आधी रात के बाद श्‍मशान में। हमारे मन में कई बार यह सवाल आए। इन्ही सवालो जवाब  ढूंढने हम निकल पढ़े अघोरियों  ढूंढने मैं |  अघोरपंथ के लोग चार स्थानों पर ही श्मशान साधना करते हैं। चार स्थानों के अलावा वे शक्तिपीठों, बगलामुखी, काली और भैरव के मुख्‍य स्थानों के पास के श्मशान में साधना करते हैं। यदि आपको पता चले कि इन स्थानों को छोड़कर अन्य स्थानों पर भी अघोरी साधना करते हैं तो यह कहना होगा कि वे अन्य श्मशान में साधना नहीं करते बल्कि यात्रा प्रवास के दौरान वे वहां विश्राम करने रुकते होंगे या फिर वे ढोंगी होंगे।
                                                                       कोलकाता 
कोलकाता से 180 किलोमीटर दूर स्थित तारापीठ धाम की खासियत यहां का महाश्मशान है। 

वीरभूम की तारापीठ (शक्तिपीठ) अघोर तांत्रिकों का तीर्थ है। यहां आपको हजारों की संख्‍या में अघोर तांत्रिक मिल जाएंगे। तंत्र साधना के लिए जानी-मानी जगह है तारापीठ, जहां की आराधना पीठ के निकट स्थित श्मशान में हवन किए बगैर पूरी नहीं मानी जाती। कहा जाता है कि यहाँ सती की दाहिनी आंख की पुतली गिरी थी इसलिए इस जगह का नाम तारापीठ पड़ा। 


पुराणों के अनुसार यह मुनि वसिष्ठ की साधना-स्थली और कलयुग में तांत्रिक साधक वामाखेपा की साधना स्थली भी है। कहा जाता है कि यहाँ मुनि वसिष्ठ ने देवी का मंदिर बनवाया था जो नष्ट हो गया। आधुनिक युग में जयव्रत नाम के एक सौदागर ने स्वप्नादेश के आधार पर मंदिर बनवायाथा। 

तारापीठ स्थान मंदिर से थोड़ा हटकर बिलकांदी गाँव में ब्रह्माक्षी नदी के किनारे पड़ता है। यहाँ के महाश्मशान में वामा खेपा और उनके शिष्य तारा खेपा नाम के दो कापालिकों की साधनाभूमि होने के चलते तारापीठ को सिद्धपीठ के तौर पर प्रसिद्धि मिली। कहते हैं कि वामा खेपा यहाँ माँ तारा को अपने हाथों से भोग खिलाते थे। मान्यता है कि यहाँ के श्मशान में जिस दिन मुर्दे नहीं जलते, उस दिन माँ तारा को कोई भोग नहीं चढ़ता और न ही तांत्रिक कुछ खाते-पीते हैं। स्थानीय तांत्रिक इसे माँ तारा का 'आदिनियम' बताते हैं। विज्ञान के इस युग में यहाँ सक्रिय तांत्रिकों की शक्ति, भक्ति और नीयत को तर्क का विषय बनाया जा सकता है लेकिन सामान्य रात्रि सहित शनिवार और खासकर दीपावली की अमावस्या की रात को यहाँ के दो बीघे में फैले महाश्मशान में सौ-डेढ़ सौ तांत्रिकों की जबर्दस्त सक्रियता देखने को मिलती है।
श्मशान में 20-20 हाथ की दूरी पर बने तांत्रिकों के झोंपड़ों में सिंदूर से लिपी-पुती मानव खोपड़ियाँ और हड्डियाँ रहस्यमय वातावरण का निर्माण करती हैं। लेकिन ऐसा कर उन्हें मिलता क्या है ? किसका कल्याण होता है ? यह पूछने के लिए आप जिस किसी तांत्रिक को पकड़ें वह दो-तीन सामान्य बातें जरूर कहेगा। मसलन, बेटा, पहले 50 रुपए निकालो... या फिर यह श्मशान की भभूति ले जाओ सारे दुख दूर होंगे या फिर आओ माँ तारा की सिद्धि कर लो...। ऐसे में अंधविश्वास का कारोबार ज्यादा हावी लगने लगता है। 
कालीघाट

कालीघाट को तांत्रिकों का गढ़ माना जाता है कोलकाता के कालीघाट में कुछ अघोरपंथियों के प्रति स्थानीय श्रद्धालुओं में श्रद्धा-भक्ति दिखती है। हालांकि, उनकी गतिविधियां ज्योतिष को लेकर ज्यादा दिखती है। साथ ही, 'हीलिंग टच' चिकित्सा की भी ख्याति है। कालीघाट के पास स्थित केवड़तला श्मशान घाट को किसी जमाने में शव साधना का केंद्र माना जाता था। यहाँ 1862 में श्मशान का निर्माण किया गया। उस दौरान कालीघाट में महिला तांत्रिकों की संख्या भी अच्छी-खासी थी। 1960 में माँ योगिनी नामक एक महिला तांत्रिक ने अपनी आध्यात्मिक क्षमताओं से असाध्य रोगों का इलाज करने का दावा किया था। उस महिला तांत्रिक के शिष्यों की संख्या आज भी कालीघाट इलाके में काफी है।



ऐसे ही एक तांत्रिक हैं बाबा मिहिर भट्टाचार्य। 75 पार के भट्टाचार्य अपनी 'दिव्य'ऊँगलियों के स्पर्श से समास्याओं के समाधान के लिए चर्चित हैं। पत्रकार जानकर बातचीत से पीछा छुड़ाते हैं लेकिन कालीघाट में उनके चेलों की अच्छी तादाद है, जिनके पास उनके द्वारा किए गए चमत्कारों का पिटारा है। कालीघाट में एक और अघोरपंथी तांत्रिक हैं - स्वामी शंकरानंद। भविष्यवाणी करने के लिए उनकी 'ख्याति' है। उनका दावा है कि मंत्रों की सिद्धि करने के लिए उन्होंने कई रातें श्मशान में गुजारी हैं। वे तंत्र विद्या की प्राचीनता पर खुलकर बात करते हैं। आधुनिक दौर में तंत्र-साधना पर विश्वास करने वालों की संख्या भले ही कम हुई हो लेकिन ऐसे लोगों की भी कमी नहीं जो तांत्रिकों तथा उनकी साधनाओं के प्रति श्रद्धा भाव रखते हैं।
कामाख्या

कामाख्या पीठ भारत का प्रसिद्ध शक्तिपीठ है, जो असम प्रदेश में है। कामाख्या देवी का मंदिर गुवाहाटी रेलवे स्टेशन से 10 किलोमीटर दूर नीलांचल पर्वत पर स्थित है। प्राचीनकाल से सतयुगीन तीर्थ कामाख्या वर्तमान में तंत्र-सिद्धि का सर्वोच्च स्थल है। कालिका पुराण तथा देवीपुराण में 'कामाख्या शक्तिपीठ' को सर्वोत्तम कहा गया है और यह भी तांत्रिकों का गढ़ है।
रजरप्पा में छिन्नमस्ता देवी का स्थान है। रजरप्पा की छिन्नमस्ता को 52 शक्तिपीठों में शुमार किया जाता है लेकिन जानकारों के अनुसार छिन्नमस्ता 10 महाविद्याओं में एक हैं। उनमें 5 तांत्रिक और 5 वैष्णवी हैं। तांत्रिक महाविद्याओं में कामरूप कामाख्या की षोडशी और तारापीठ की तारा के बाद इनका स्थान आता है।  

शैव संप्रदाय में साधना की एक रहस्यमयी शाखा है अघोरपंथ। अघोरी की कल्पना की जाए तो श्मशान में तंत्र क्रिया करने वाले किसी ऐसे साधु की तस्वीर जेहन में उभरती है जिसकी वेशभूषा डरावनी होती है। अघोरियों के वेश में कोई ढोंगी आपको ठग सकता है लेकिन अघोरियों की पहचान यही है कि वे किसी से कुछ मांगते नहीं है और बड़ी बात यह कि तब ही संसार में दिखाई देते हैं जबकि वे पहले से नियुक्त श्मशान जा रहे हो या वहां से निकल रहे हों। दूसरा वे कुंभ में नजर आते हैं।



अघोरी को कुछ लोग ओघड़ भी कहते हैं। अघोरियों को डरावना या खतरनाक साधु समझा जाता है लेकिन अघोर का अर्थ है अ+घोर यानी जो घोर नहीं हो, डरावना नहीं हो, जो सरल हो, जिसमें कोई भेदभाव नहीं हो। कहते हैं कि सरल बनना बड़ा ही कठिन होता है। सरल बनने के लिए ही अघोरी कठिन रास्ता अपनाते हैं। साधना पूर्ण होने के बाद अघोरी हमेशा- हमेशा के लिए हिमालय में लीन हो जाता है।जिनसे समाज घृणा करता है अघोरी उन्हें अपनाता है। लोग श्मशान, लाश, मुर्दे के मांस व कफन आदि से घृणा करते हैं लेकिन अघोर इन्हें अपनाता है। अघोर विद्या व्यक्ति को ऐसा बनाती है जिसमें वह अपने-पराए का भाव भूलकर हर व्यक्ति को समान रूप से चाहता है, उसके भले के लिए अपनी विद्या का प्रयोग करता है।



अघोर विद्या सबसे कठिन लेकिन तत्काल फलित होने वाली विद्या है। साधना के पूर्व मोह-माया का त्याग जरूरी है। मूलत: अघोरी उसे कहते हैं जिसके भीतर से अच्छे-बुरे, सुगंध-दुर्गंध, प्रेम-नफरत, ईर्ष्या-मोह जैसे सारे भाव मिट जाएं। सभी तरह के वैराग्य को प्राप्त करने के लिए ये साधु श्मशान में कुछ दिन गुजारने के बाद पुन: हिमालय या जंगल में चले जाते हैं।

अघोर पंथ को शैव और शाक्त संप्रदाय की एक तांत्रिक शाखा माना गया है। अघोर पंथ की उत्पत्ति काल के बारे में कोई निश्चित प्रमाण नहीं है, लेकिन इन्हें कपालिक संप्रदाय के समकक्ष मानते हैं। वाराणसी या काशी को भारत के सबसे प्रमुख अघोर स्थान के तौर पर मानते हैं। अघोर पंथ हिंदू धर्म का एक संप्रदाय है। इसका पालन करने वालों को अघोरी कहते हैं। अघोर पंथ की उत्पत्ति के काल के बारे में अभी निश्चित प्रमाण नहीं मिले हैं, परन्तु इन्हें कपालिक संप्रदाय के समकक्ष मानते हैं। ये भारत के प्राचीनतम धर्म "शैव" (शिव साधक) से संबधित हैं। अघोर संप्रदाय के व्यक्ति अपने विचित्र व्यवहार, एकांतप्रियता और रहस्यमय क्रियाओं की वजह से जाने जाते हैं।अघोर पंथ के प्रणेता भगवान शिव माने जाते हैं। कहा जाता है कि भगवान शिव ने स्वयं अघोर पंथ को प्रतिपादित किया था। अवधूत भगवान दत्तात्रेय को भी अघोरशास्त्र का गुरू माना जाता है। अवधूत दत्तात्रेय को भगवान शिव का अवतार भी मानते हैं। अघोर संप्रदाय के विश्वासों के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु और शिव इन तीनों के अंश और स्थूल रूप में दत्तात्रेय जी ने अवतार लिया। अघोर संप्रदाय के एक संत के रूप में बाबा किनाराम की पूजा होती है। अघोर संप्रदाय के व्यक्ति शिव जी के अनुयायी होते हैं। इनके अनुसार शिव स्वयं में संपूर्ण हैं और जड़, चेतन समस्त रूपों में विद्यमान हैं। अघोर संप्रदाय के साधक समदृष्टि के लिए नर मुंडों की माला पहनते हैं और नर मुंडों को पात्र के तौर पर प्रयोग भी करते हैं। चिता के भस्म का शरीर पर लेपन और चिताग्नि पर भोजन पकाना इत्यादि सामान्य कार्य हैं। अघोर दृष्टि में स्थान भेद भी नहीं होता अर्थात महल या श्मशान घाट एक समान होते हैं।वाराणसी या काशी को भारत के सबसे प्रमुख अघोर स्थान के तौर पर मानते हैं। भगवान शिव की स्वयं की नगरी होने के कारण यहां विभिन्न अघोर साधकों ने तपस्या भी की है। यहां बाबा कीनाराम का स्थल एक महत्त्वपूर्ण तीर्थ भी है। काशी के अतिरिक्त गुजरात के जूनागढ़ का गिरनार पर्वत भी एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। जूनागढ़ को अवधूत भगवान दत्तात्रेय के तपस्या स्थल के रूप में जानते हैं।अघोर संप्रदाय के साधक मृतक के मांस के भक्षण के लिए भी जाने जाते हैं। मृतक का मांस जहां एक ओर सामान्य जनता में अस्पृश्य होता है वहीं इसे अघोर एक प्राकृतिक पदार्थ के रूप में देखते हैं और इसे उदरस्थ कर एक प्राकृतिक चक्र को संतुलित करने का कार्य करते हैं। मृत मांस भक्षण के पीछे उनकी समदर्शी दृष्टि विकसित करने की भावना भी काम करती है। कुछ प्रमाणों के अनुसार अघोर साधक मृत मांस से शुद्ध शाकाहारी मिठाइयां बनाने की क्षमता भी रखते हैं। लोक मानस में अघोर संप्रदाय के बारे में अनेक भ्रांतिया और रहस्य कथाएं भी प्रचलित हैं। अघोर विज्ञान में इन सब भ्रांतियों को खारिज कर के इन क्रियाओं और विश्वासों को विशुद्ध विज्ञान के रूप में तार्किक ढ़ंग से प्रतिष्ठित किया गयाहै।
उत्तर भारत  के गंगा तट पर बसा दुनिया में सबसे पुराना शहर वाराणसी भारत की आध्यात्मिक राजधानी है, यह सात पवित्र शहरों (के पवित्रतम सप्त पुरी) में से एक है  मणिकर्णिका घाट, वाराणसी का सबसे पुराना घाट है, इस घाट के साथ कई पौराणिक कथाएं जुडी हुई है। एक पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान शिव ने अपनी पत्‍नी पार्वती को अकेला छोड़कर यहां काफी समय बिताया था अघोरी मानते हैं कि जो लोग दुनियादारी और गलत कामों के लिए तंत्र साधना करते हैं अंत में उनका अहित ही होता है। श्मशान में तो शिव का वास है उनकी उपासना हमें मोक्ष की ओर ले जाती है। सबसे पहले अघोरी चंद्रपाल ने श्‍मशान का मुआयना किया। फिर कुछ बुदबुदाने लगा। इस बीच उसके चेहरे पर अजीब-सी मुस्कान फैल गई। इसके बाद उसने शिप्रा नदी में कुछ जलते दीये विसर्जित किए। हमें बताया गया, ये दीये आत्मा को श्‍मशान तक आने का रास्ता दिखाते हैं।

अघोरी ने चिता पर से पाँव हटाया और मुर्गे की बलि चढ़ाकर मांस-मदिरा का प्रसाद चढ़ाया। प्रसाद वितरित करने के बाद अघोरी ने हमें वहाँ से चले जाने का इशारा किया। शिष्य ने बताया कि अब चांडाल साधना का वक्त आ गया है। अघोरी निर्वस्त्र होकर शव साधना करेंगे|



माहौल में एक अजीब-सी गंध थी। राख और चमड़ी जलने की गंध। उसमें घुली अगरबत्तियों और धूपबत्ती की खुशबू। इस माहौल के बीच अघोरी का रूप बड़ा भयावह लग रहा था। दीपदान के बाद कुछ देर यूँ ही बुदबुदाने के बाद अघोरी ने चिता के चारों ओर लकीर खींच दी और हमें लकीर के अंदर आने से साफ मना कर दिया। फिर उसने तुतई बजाना शुरू किया। अघोरी के शिष्य ने बताया कि ऐसा करके अघोरी अन्य प्रेत-पिशाचों को अपनी साधना में विघ्न डालने से रोकता है। 

इसके बाद अघोरी ने तेजी से चिता के चारों ओर चक्कर लगाना शुरू कर दिया। चक्कर लगाते समय अघोरी चुपचाप कुछ बुदबुदाता रहा था। साथ ही चिता पर जल छिड़कता जा रहा था। इसके बाद अचानक अघोरी कुछ उचका और जलती चिता के ऊपर उसने एक पाँव रख दिया। इसके बाद साधना जारी रही। हम काफी देर अघोरी को इसी अवस्था में देखते रहे। 

अघोरी ने अपना तप जारी रखा। मिनटों के बाद लगभग एक घंटा व्यतीत हो गया। इसके बाद अघोरी ने चिता पर से पाँव हटाया और काले मुर्गे की बलि चढ़ाकर मांस-मदिरा का प्रसाद चढ़ाया। अपने साथियों को प्रसाद वितरित करने के बाद अघोरी ने हमें वहाँ से चले जाने का इशारा किया। अघोरी के शिष्य ने बताया कि अब चांडाल साधना का वक्त आ गया है। अब अघोरी निर्वस्त्र होकर शव साधना करेंगे। इस साधना को देखना बेहद दुरूह है, इसलिए हमें जाना ही होगा।

हम बोझिल मन से वहाँ से हट गए। श्‍मशान से निकलने के बाद भी विचित्र गंध हमारा पीछा नहीं छोड़ रही थी। शव साधना के बाद क्या मुर्दा जीवित होता है, हमारा यह सवाल अधूरा ही रह गया, लेकिन इस सफर में हमने जाना कि कुछ लोग इस दुनिया से परे अलग ही दुनिया में मस्त रहते हैं|



इनका कहना है कि वे लोग जो दुनियादारी और गलत कामों के लिए तंत्र साधना करते हैं अंत में उनका अहित ही होता है। शमशान में तो शिव का वास है उनकी उपासना हमें मोक्ष की ओर ले जाती है। इन लोगों ने हमें समझाया अघोरी का मतलब है- घोर साधना करने वाला। जिस निर्जन श्‍मशान में हम दिन में जाने से भी डरते हैं, वे यहाँ रात को चैन की बंसी बजाते हैं।



हम अपने इस सफर में जितने भी अघोरियों से मिले, उनमें एक बात समान रूप से देखने को मिली कि जलती गर्म चिता में तप करने के कारण इन सभी के पाँव नीले पड़ चुके थे, लेकिन इन्हें इस बात से कुछ फर्क नहीं पड़ता। ये तो बस अपनी साधना में रत रहना चाहते हैं। अब आप इसे जो भी समझें,लेकिन हमारे ही समाज में यह एक ऐसा तबका है, जो घोर-अँधेरी रात में ही अपना काम करता है। 


1. अघोरी मूलत: तीन तरह की साधनाएं करते हैं। शिव साधना, शव साधना और श्मशान साधना। शिव साधना में शव के ऊपर पैर रखकर खड़े रहकर साधना की जाती है। बाकी तरीके शव साधना की ही तरह होते हैं। इस साधना का मूल शिव की छाती पर पार्वती द्वारा रखा हुआ पैर है। ऐसी साधनाओं में मुर्दे को प्रसाद के रूप में मांस और मदिरा चढ़ाई जाती है।



शव और शिव साधना के अतिरिक्त तीसरी साधना होती है श्मशान साधना, जिसमें आम परिवारजनों को भी शामिल किया जा सकता है। इस साधना में मुर्दे की जगह शवपीठ (जिस स्थान पर शवों का दाह संस्कार किया जाता है) की पूजा की जाती है। उस पर गंगा जल चढ़ाया जाता है। यहां प्रसाद के रूप में भी मांस-मदिरा की जगह मावा चढ़ाया जाता है। 



अघोरी शव साधना के लिए शव कहाँ से लाते है?

हिन्दू धर्म में आज भी किसी 5 साल से कम उम्र के बच्चे, सांप काटने से मरे हुए लोगों, आत्महत्या किए लोगों का शव जलाया नहीं जाता बल्कि दफनाया या गंगा में प्रवाहित कर कर दिया जाता है।  पानी में प्रवाहित ये शव डूबने के बाद हल्के होकर पानी में तैरने लगते हैं।  अक्सर अघोरी तांत्रिक इन्हीं शवों को पानी से ढूंढ़कर निकालते और अपनी तंत्र सिद्धि के लिए प्रयोग करते हैं।

2. बहुत कम लोग जानते हैं कि अघोरियों की साधना में इतना बल होता है कि वो मुर्दे से भी बात कर सकते हैं। ये बातें पढऩे-सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन इन्हें पूरी तरह नकारा भी नहीं जा सकता। उनकी साधना को कोई चुनौती नहीं दी जा सकती।

 अघोरियों के बारे में कई बातें प्रसिद्ध हैं जैसे कि वे बहुत ही हठी होते हैं, अगर किसी बात पर अड़ जाएं तो उसे पूरा किए बगैर नहीं छोड़ते। गुस्सा हो जाएं तो किसी भी हद तक जा सकते हैं। अधिकतर अघोरियों की आंखें लाल होती हैं, जैसे वो बहुत गुस्सा हो, लेकिन उनका मन उतना ही शांत भी होता है। काले वस्त्रों में लिपटे अघोरी गले में धातु की बनी नरमुंड की माला पहनते हैं।

3. अघोरी अक्सर श्मशानों में ही अपनी कुटिया बनाते हैं। जहां एक छोटी सी धूनी जलती रहती है। जानवरों में वो सिर्फ  कुत्ते पालना पसंद करते हैं। उनके साथ उनके शिष्य रहते हैं, जो उनकी सेवा करते हैं। अघोरी अपनी बात के बहुत पक्के होते हैं, वे अगर किसी से कोई बात कह दें तो उसे पूरा करते हैं।

4. अघोरी गाय का मांस छोड़ कर बाकी सभी चीजों को खाते हैं। मानव मल से लेकर मुर्दे का मांस तक। अघोरपंथ में श्मशान साधना का विशेष महत्व है। इसलिए वे श्मशान में रहना ही ज्यादा पंसद करते हैं। श्मशान में साधना करना शीघ्र ही फलदायक होता है।
श्मशान में साधारण मानव जाता ही नहीं। इसीलिए साधना में विध्न पडऩे का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। उनके मन से अच्छे बुरे का भाव निकल जाता है, इसलिए वे प्यास लगने पर खुद का मूत्र भी पी लेते हैं।

5. अघोरी अमूमन आम दुनिया से कटे हुए होते हैं। वे अपने आप में मस्त रहने वाले, अधिकांश समय दिन में सोने और रात को श्मशान में साधना करने वाले होते हैं। वे आम लोगों से कोई संपर्क नहीं रखते। ना ही ज्यादा बातें करते हैं। वे अधिकांश समय अपना सिद्ध मंत्र ही जाप करते रहते हैं।

6. आज भी ऐसे अघोरी और तंत्र साधक हैं जो पराशक्तियों को अपने वश में कर सकते हैं। ये साधनाएं श्मशान में होती हैं और दुनिया में सिर्फ  चार श्मशान घाट ही ऐसे हैं जहां तंत्र क्रियाओं का परिणाम बहुत जल्दी मिलता है। ये हैं तारापीठ का श्मशान (पश्चिम बंगाल), कामाख्या पीठ (असम) काश्मशान, त्र्र्यम्बकेश्वर (नासिक) और उज्जैन (मध्य प्रदेश) का श्मशान। 

श्मशान यानी कि जिंदगी का ाखिरी पड़ाव। ऐसा पड़ाव जहां आने के बाद दुनिया की तमाम चीजे बेमांग हो जाती हैं। मगर जिंदगी के इसी आखिरी पड़ाव पर कुछ लोग ऐसे भी हैं जो मूर्दों को नोचकर उनमें जिंदगी तलाशते हैं। जी हां उनके लिये इंसानी खोपड़ी शराब पीने का प्याला बन जाता है और मूर्दा निवाला। श्मशान बिस्तर बन जाती है और चिता चादर। फिर जरा सोचिए कि वो मंजर क्या होगा? जब दुनिया सोती है तब वो जागते हैं। उनकी अलग ही मायावी दुनिया है। तो आज हम ऐसे लोगों की जिंदगी से पर्दा उठाएंगे जो मूर्दों से जिंदगी उधार लेते हैं और उनकी खुद की जिंदगी सदियों से रहस् के पर्दे में है।
हम बात कर रहे हैं श्मशान की साधाना में इंसानी चोलों को उतारकर फेंक देने वाले अघोरियों की। ये अघोरी भी इंसानी जमात का एक हिस्सा हैं जो मूर्दों में भगवान ढूंढते हैं। खास बात यह है कि ये इंसानी खोपड़ी का सौदा करते हैं। अघोरी जो कुछ भी खाते हैं या पीते हैं वो सिर्फ इंसानी खोपड़ी में। खास बात यह है कि ये जूर्म करके भी ये कानून की लंबी पकड़ से कोसो दूर हैं। पुलिस को उनके इस घिनौनी करतूत का पता होता है मगर अक्सर वह शिकायत करने वालों का इंतजार ही करती रह जाती है।
अघोरी करते हैं इंसानी खोपड़ी का काला कारोबार
कहते हैं कि इंसानी खोपड़ी से खतरनाक कुछ भी नहीं होता मगर तभी तक जबतक खोपड़ी काम कर रही हो। मगर श्मशान में अपना बसेरा बनाने वाले अघोरियों के लिये मूर्दे की खोपड़ी भी लाखों की होती है। काफी जद्दोजहद के बाद गंगा किनारे घूमने वाले एक अघोरी ने बताया कि उसने अबतक लाखों इंसानी खोपड़ी बेचे हैं। उसका कहना है कि शहरों में रहने वाले कई करोबारी इसका सौदा करते हैं। उसने बताया कि मैं इस काम को बचपन से कर रहा हूं और बहुत बड़े-बड़े लोगों से मेरी पहचान हो चुकी है।
अब आईए आपको इस अघोरी के बारे में बताते हैं। इसका नाम राम सिंह हैं और वह कानून का एक भगोड़ा मुजरिम हैं। उसके उपर पत्नी की हत्या का आरोप है। उसे जिंदा अपनों में रहने के सिवा मूर्दों के बीच रहना इसलिये अच्छा लगता है क्योंकि मूर्दों की ना तो अपनी कोई पुलिस होती है और ना ही कोई खुफिया तंत्र।
 अघोरी का रूप लेकर कानून से बचते हैं शातिर मुजरिम
मूर्दों के बीच मंडराते अघोरी दुनिया के किसी भी बुराई को बुरा नहीं कहते। अघोरियों के बारे में लोगों को जितनी जानकारी हैं उससे कहीं ज्यादा अफवाह। शायद यहीं कारण है कि मौजूदा समय में मुजरिम अघोरी का रूप लेकर कानून को चकमा दे रहे हैं। लाज़मी है कि जब जीना है तो खाना और पीना भी है। इसलिये वो अधर्म जाल में फांसकर लोगों से इंसानी खोपड़ी का सौदा करते हैं। ये खुद को इसकदर ढाल चुके होते हैं कि इनके तक पहुंचना सबके बूते की बात नहीं होती।
उन्हें इंसानों की तरह और इंसानों के बीच रहना पसंद नहीं होता। उनकी अलग दुनिया होती है जिसमें वो दावा करते हैं कि वह एक स्थान पर बैठे दूसरे स्थान पर देख सकते हैं। इतना ही नहीं उनका दावा यह भी होता है कि उनके बुलाने पर आत्मा भी दौड़ी चली आती है। यह तो रहा अघोरियों और अपराधियों के बीच का कनेक्शन मगर क्या आपने कभी किसी असली अघोरी को देखा है?

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